परम्परा और तकनीक के समन्वय से रामलीलाओं को मिलने लगी संजीवनी

 परम्परा और तकनीक के समन्वय से रामलीलाओं को मिलने लगी संजीवनी
rishi

गोपेश्वर : रामलीला की परम्परा को तकनीक सहयोग मिनले से आयोजनों का प्रसार बढने लगा है। परम्परा और तकनीक के समन्वय से रामलीलाओं को संजीवनी मिली है। जहां स्थानीय बुजुर्ग घरों में बैठकर रामलीला मंचन का आनंद ले रहे हैं। वहीं देश या विदेश में रोजगार के लिये निवास कर रहे प्रवासी भी इन सामाजिक आयोजनों में प्रतिभाग कर पा रहे हैं।
चमोली जिले में पूर्व से आस्था के साथ मनोरंजन के लिये पौराणिक काल से रामलीला आयोजन की परम्परा रही है। लेकिन टीवी, मोबाइल और गांवों से होते पलायन के चलते रामलीलाओं आयोजन घटते जा रहे थे। ऐसे में अब संचार सेवा के विस्तार से रामलीलाओं का प्रसार बढ गया है। इन दिनों चमोली जिले में आयोजित रामलीलाओं को आयोजक फेसबुक, यूट्यूब और अन्य संचार माध्यमों से लाइव प्रसारित कर रहे हैं। जिसे अपने घरों से दूर निवास कर रहे लोग खूब पसंद कर रहे हैं। ऐसे में लीलाओं के भौतिक रुप से न जुड़ पाने वाले लोग को भी आयोजन से जुड़ पाने की सुविधा मिल रही है। रामलीला में एलईटी के माध्यम से मंच पर दृष्यों को सजीवत प्रदान की जा रही है. वंही लाइव प्रसारण से प्रवासी उत्तराखंडियों के साथ ही अन्य लोग भी रामलीला से जुड़ रहे हैं।

क्या कहते हैं प्रवासी लोग—–
चमोली के हरिद्वार में रोजगार के लिये रह रहे हीरा सिंह का कहना है कि रोजगार के चलते क्षेत्र में हो रहे सामुहिक आयोजनों से जुड़ पाना कठिन हो रहा था। लेकिन इस वर्ष गोपेश्वर नगर में हो रही रामलीला के लाइव प्रसारण से जुड़ कर आत्म संतुष्टि मिल रही है। वहीं कानपुर में निवास कर रही रेखा खंडूरी और मुम्बई निवासी मीना डिमरी का कहना है कि परिवारिक जिम्मेदारियों के चलते मायके में आयोजित होने वाले रामलीला जैसे आयोजनों से नहीं जुड़ पा रहे थे। लेकिन तकनीक की मदद से अब जहां आयोजनों से जुड़ पा रहे हैं। वहीं आयोजनों को सहयोग करने की इच्छा भी पूरी हो पा रही है।

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