लोगों को भा रहा मुल्या गांव के विक्रम सिंह का मिश्रित स्वरोजगार माॅडल

 लोगों को भा रहा मुल्या गांव के विक्रम सिंह का मिश्रित स्वरोजगार माॅडल
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चमोली: राज्य के पहाड़ी गांवों में रोजगार को लेकर पलायन की बात आम हो चुकी है। ऐसे में जिले के सिदोली गांव के विक्रम सिंह ने स्वरोजगार के माध्यम से पलायन पर प्रभावी रोक लगाने का माॅडल प्रस्तुत किया है। यदि विक्रम सिंह के स्वरोजगार के माॅडल को युवाओं द्वारा अपनाया जाता है, तो जिले के खाली हो रहे गांव एक बार फिर गुलजार हो सकते हैं।

बता दें, चमोली के कर्णप्रयाग ब्लाक की सिदोली पट्टी में गौचर से 20 किमी की दूरी पर स्थित मुल्या गांव (ग्वाड) निवासी 48 वर्षीय विक्रम सिंह बिष्ट लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बनने लगे हैं। उनका स्वरोजगार माॅडल लोगों को पसंद आ रहा है। लोग स्वरोजगार के उनके माॅडल को देख गांवों में स्वरोजगार का मन बना रहे हैं। उन्होने कृषि, बागवानी, उद्यानीकरण, सब्जी उत्पादन, फूल उत्पादन से लेकर मत्स्य पालन, विभिन्न प्रजातियों की पौध तैयार करने वाली नर्सरी, हर क्षेत्र में हाथ आजमाया। वे एक बेहतरीन हस्तशिल्पि भी हैं। बेजान लकडियो में भी वे कलाकारी से जान फूंक देते हैं। उन्हें जहां जहां सफलता मिली उसको जारी रखा बाकी असफलता वाले क्षेत्रों को छोड दिया। उन्होंने असफलताओं से कभी भी घबराना और हारना नहीं सीखा। बस अपनी जिद और जुनून की बदौलत अपनी पहचान खुद बनायी।


क्या है विक्रम सिंह का स्वरोजगार माॅडल…..

परिवारिक परिस्थितियों के कारण मैट्रिक तक की पढाई करने वाले विक्रम सिंह ने 1992 में उद्योग विभाग से 25 हजार का ऋण लेकर लघु उद्योग शुरू किया। लकडी सहित अन्य कार्य आरम्भ किया। जिसके बाद पहाड़ी परिवेश में पले बढे विक्रम ने अपने मेहतन के बूते कलम के माध्यम संतरे के पेड़ तैयार किये। इससे उत्साहित होकर उन्होंने वर्ष 2000 में अलंकार नर्सरी तैयार की। जहां उन्होंने नर्सरी में माल्टा, नींबू, नारंगी, सेब, अखरोट सहित विभिन्न प्रजातियों की पौध तैयार की। जिसके बाद सड़क निर्माण से उनकी नर्सरी को नुकसान होने के बाद पुनः उन्होेंन अन्य स्थान पर नर्सरी तैयार की और 2002 और 2004 में दो पाॅलीहाउस लगाकर सब्जियों का उत्पादन भी शुरू कर दिया। जिससे राई, लहसुन, प्याज, टमाटर, बैंगन, बंद गोबी, फूल गोबी, ब्रोकाॅली, अदरक, धनियां जैसे सब्जी और अन्य उत्पादों से उन्होंने बेहतर मुनाफा कमाया। 2005 में पहली बार जब कीवी के बाजार भाव का पता चला तो उन्होंने 10 पौधों का रोपण किया और चार वर्ष की मशक्कत के बाद वर्ष 2009 में पहली पैदावार प्राप्त की। जिसके बाद से वे प्रतिवर्ष 5 से 6 कुंतल कीवी का विपणन कर बेहतर आय प्राप्त कर रहे हैं। विक्रम सिंह ने ट्राउड मत्स्य पालन के लिये छः टैंक भी बनाये जहंा वे अब नर्सरी, सब्जी उत्पादन, कीवी और अन्य फल उत्पादन के साथ मत्स्य पालन को मिलाकर उन्होंने स्वरोगार का कारगर और सतत चलने वाला माॅडल तैयार किया है।


पलायन और स्वरोजगार को लेकर क्या कहते हैं विक्रम सिंह……

विक्रम सिंह बिष्ट कहते हैं कि पलायन के कारण पहाड़ खाली हो रहा हंै। लेकिन यदि सुनियोजित तरीके से और दीर्घकालीन सोच लेकर कार्य किया जाय तो पहाड़ की बंजर भूमि में भी सोना उगाया जा सकता है। वे कहते हैं कि आने वाले समय में वे हर्बल खेती, नगदी फसलों की खेती करने की योजना है। इस दिशा प्रयास जारी है। वर्तमान में प्रतिस्पर्धा का दौर है इसलिए हमें मिश्रित  स्वरोजगार माॅडल के माध्यम से कार्य करना होगा।

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