मकर संक्रांति : जानिये क्यों है यह शुभ पर्व, पुण्य काल का समय और पूजा विधि

 मकर संक्रांति : जानिये क्यों है यह शुभ पर्व, पुण्य काल का समय और पूजा विधि
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प्रदीप लखेड़ा ( गौचर ) : हिन्दू धार्मिक मान्यताओं में मकर संक्रांति का धार्मिक व ज्योतिषीय महत्व है। क्योंकि इस दिन सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है और मकर राशि में प्रवेश करता है।

14 जनवरी, शुक्रवार को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा। यह पर्व अपने आप में बहुत महत्व रखने वाला होता है। इसका संबंध खगोल से भी है, ज्योतिष से भी, मौसम से भी और धर्म से भी। मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहा जाता है। इस दिन का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व है, क्योंकि इस दिन सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है और मकर राशि में प्रवेश करता है। वेदों में, भगवान सूर्य को ’पिता’ के रूप में जाना जाता है।

भारत में इतने नामों से मनाई जाती है मकर संक्रांति :

असम में माघ बिहू, पंजाब में माघी, हिमाचल प्रदेश में माघी साजी, जम्मू में माघी संग्रांद या उत्तरायण (उत्तरायण), हरियाणा में सकरत, मध्य भारत में सुकरत, तमिलनाडु में पोंगल, गुजरात और उत्तर प्रदेश में उत्तरायण, उत्तराखंड में घुघुटी, ओडिशा में मकर संक्रांति, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा, पश्चिम बंगाल (जिसे पौष संक्रांति भी कहा जाता है), उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश (जिसे खिचड़ी संक्रांति भी कहा जाता है) या आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में संक्रांति के रूप में।

इस दिन भक्त सूर्य को अर्घ्य देते हैं, भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं और चावल, दाल, गुड़, मटर, रेवड़ी आदि दान करते हैं ।


मकर संक्रांति की तिथि और शुभ मुहूर्त :

दिनांकः 14 जनवरी, शुक्रवार

मकर संक्रांति पुण्य काल – दोपहर 02ः43 से शाम 05ः45 बजे तक

मकर संक्रांति महा पुण्य काल – 02ः43 अपराह्न से 04ः28 अपराह्न

मकर संक्रांति क्षण – 02ः43 अपराह्न


मकर संक्रांति की पूजा विधि

– एक लकड़ी की चौकी रखें और इसे साफ करने के लिए थोड़ा गंगाजल छिड़कें। फिर उस पर कलश लगाएं।

– अब, प्रत्येक ढेर पर भगवान गणेश, भगवान शिव, भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और सूर्य भगवान की मूर्ति/मकर संक्रांति पर इसलिए खाई जाती है ’खिचड़ी’, गुरु गोरखनाथ ने दिया था ।

– तेल का दीपक जलाकर देवताओं के सामने रखें।

– एक-एक करके सभी देवताओं पर थोड़ा-सा जल छिड़कें।

– भगवान गणेश का आह्वान करके और उनका आशीर्वाद मांगकर पूजा शुरू करें।

– हल्दी, चंदन, कुमकुम, दूर्वा घास, फूल, धूप और एक फल चढ़ाएं।

-गणेश गायत्री मंत्र का जाप करेंः

ओम एकदंताय विद्धमहे, वक्रतुंडय धीमहि तन्नो दंति प्रचोदयत, रुद्र गायत्री मंत्रः ओम तत्पुरुषाय विद्माहे महादेवय धिमहि तन्नो रुद्रा प्रचोदयत,

लक्ष्मी गायत्री मंत्रः ओम महालक्षमैच्य विद्महे विष्णु पटनाच्य धीमही तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात

– आरती कर पूजा समाप्त करें और फिर प्रसाद बांटें


मकर संक्रांति का महत्व :-

हिंदू मान्यता के अनुसार, पवित्र नदी गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा और कावेर में डुबकी लगाने का बहुत महत्व है। यह आपके सभी अतीत और वर्तमान पापों को धो देता है और आपको एक स्वस्थ, समृद्ध और सफल जीवन प्रदान करता है। भारत के कई हिस्सों में, जैसे कि यूपी, बिहार, पंजाब और तमिलनाडु में, यह नई फसलों की कटाई का समय है। किसान इस दिन को कृतज्ञता दिवस के रूप में भी मनाते हैं।


गर्म वस्त्रों का दान करने से शुभ फल की प्राप्ति :-

गरीब और असहाय लोगों को गर्म कपड़े का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इस माह में लाल और पीले रंग के वस्त्र धारण करने से भाग्य में वृद्धि होती है। माह के रविवार के दिन तांबे के बर्तन में जल भर कर उसमें गुड़, लाल चंदन से सूर्य को अर्ध्य देने से पद सम्मान में वृद्धि होने के साथ शरीर में सकारात्मक शक्तियों का विकास होता है। साथ ही आध्यात्मिक शक्तियों का भी विकास होता है।

संक्रांति की पौराणिक कथा :

मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का संहार उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर फेंका था। भगवान की जीत को मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति से ही ऋतु में परिवर्तन होने लगता है। शरद ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है और इसके बाद बसंत मौसम का आगमन आरंभ हो जाता है। इसके फलस्वरूप दिन लंबे और रात छोटी होने लगती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव के घर जाते हैं। ऐसे में पिता और पुत्र के बीच प्रेम बढ़ता है। ऐसे में भगवान सूर्य और शनि की अराधना शुभ फल देने वाला होता है।

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