वर्षों से औखांण की परम्परा को संजो रहे डा. वेणीराम अंथवाल

 वर्षों से औखांण की परम्परा को संजो रहे डा. वेणीराम अंथवाल
rishi

चमोली : उत्तराखंड की युवा पीढी लोकभाषा से दिनों दिन दूर होती जा रही है। ऐेस में लोकभाषा की समृद्ध औखांण (गढवाली कहावत) जैसी परम्परा भी लुप्त होने लगी है। ऐसे में राजकीय महाविद्यालय कर्णप्रयाग में इतिहास विभाग के प्रवक्ता डा. वेणीराम अंथवाल की ओर से औंखाण परंपरा को संजोने के लिये किया जा रहा कार्य लोकभाषा के संरक्षण को लेकर आस बंधा रहा है।

डा. वेणीराम अंथवाल

बातों में वन लाइनर, मुहावरों और कहावतों का उपयोग कर लोग अपने बातों प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत कर पाते हैं। लेकिन गढवाली लोकभाषा के सीमित प्रसार और भावी पीढी के दूरी बनाने से गढवाली औखांण की परम्परा अब खत्म होने लगी है। ऐसे में लोकभाषा की इस समृद्ध परम्परा के संरक्षण में डा. वेणी राम अंथवाल जुटे हुए हैं। अंथवाल ने 16 वर्षों तक सतत परिश्रम कर लोकभाषा में उपयोग की जाने वाली 833 औखांण का संग्रह कर प्रकाशित किया है। उनके प्रयासों से प्रकाशित पुस्तक उत्तराखंड के लोक-जीवन की समृद्ध परम्परा औखांण को इंडिया व एशिया बुक ऑफ रिकार्ड में शामिल कर उन्हें सम्मानित भी किया गया है।

क्या है औखांण —
औखांण गढवाली लोकभाषा की कहावतों को कहा जाता है। जिनके उपयोग से कम शब्दों में अपनी बात को मनोरंजक और दिलचस्प तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

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