सात दशक बाद चांई गांव में बिस्कम जागर मेले का हुआ आयोजन

 सात दशक बाद चांई गांव में बिस्कम जागर मेले का हुआ आयोजन
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जोशीमठ (महादीप पंवार) : ब्लॉक के चाईं गांव में 70 वर्षों बाद इस धार्मिक मेले का आयोजन किया गया। तीन दिनों तक आयोजित होने वाले इस मेले का शुभारंभ देवता ही करते है। चाईं गांव में थैंग गांव के देवताओं द्वारा मेले का उद्घाटन किया गया। जिसके बाद गांव में तीन दिवसीय मेले का आगाज हो गया है।

चाईं गांव में 70 वर्ष पश्चात आयोजित हो रहे इस मेले में अंतिम दिन 3000 श्रद्धालुओं ने मेले में उपस्थित होकर मेले में भगवान विश्कर्मा का आशीर्वाद लिया। इस अवसर पर बदरीनाथ विधायक महेंद्र भट्ट, नगर पालिका अध्यक्ष शैलेन्द्र पंवार, ब्लॉक प्रमुख हरीश परमार, विश्वकर्मा मेला कमेटी चाईं के अध्यक्ष जोत सिंह चौहान, संरक्षक शंकर सिंह पंवार, क्षेत्र पंचायत सदस्य प्रियंका देवी, महिला मंगलदल अध्यक्षा रोशनी देवी समेत अन्य लोग मौजूद रहे।

  • क्या है बिस्कम जागर (विश्वकर्मा जागर) मेला…..

जोशीमठ प्रखंड के गांवों में विश्वकर्मा जागर मेले का आयोजन दशकों के अंतराल में आयोजित होता है। देवशिल्पी भगवान विश्कर्मा की स्मृति में गांवों की संयुक्त पंचायतों द्वारा विश्वकर्मा जिसे स्थानीय बोली में बिस्कम के नाम से संबोधित किया जाता है, मनाया जाता है। प्रखंड के मल्ली टंगनी से विश्वकर्मा के जागरियों को आमंत्रित किया जाता है। जो तीन दिनों तक समस्त पारम्परिक परंपराओं एवं विधि-विधान से भगवान विश्वकर्मा की स्तुति और अनुष्ठान जागरों के माध्यम से करते है। आयोजन की शुरुआत गांव के विश्वकर्मा मंदिर में रंगरोगन, विभिन्न देवताओं- विष्णु भगवान के 10 अवतार, सप्त ग्रह चित्र मंदिर की दीवारों पर उकेरे जाते है। उकेरे गए चित्रों की आंख अंत में बनाई जाती है जिसे चित्रों का आंख खोलना कहा जाता है और विभिन्न देव पस्वा उस समय अवतरित होते है। उसके बाद जागरियों द्वारा जागर गायन की विधिवत शरुआत की जाती है। जो मेले के समापन तक जारी रहते हैं। मेले के दूसरे दिन परम्परानुसार मुख्य अतिथि अगला गांव होगा जो पहले से मेले की बही में उल्लिखित होता है। आने वाले वर्षों में उस गांव के लोग विश्वकर्मा जागर मेले को कराए इस आशीर्वाद के साथ वो अपने साथ देवता की भेंट शगुन के रूप में ले जाते है। मेले के तीसरे दिन विभिन्न देव पस्वाओं का नृत्य होता है और विश्वककर्मा क पस्वा द्वारा बनाये गए भोज में खड्ग ठोका जाता है। श्री कृष्ण का बाल रूप में गरुड़ में बैठ कर आना और कंश का वध मेले का मुख्य आकर्षण होता है। मेले के अनेक पहरों में देव पश्वा अवतरित होते हैं। क्षेत्र के लोगों को कुशल-क्षेम पूछकर अपना आशीर्वाद क्षेत्रवासियों को देते है। मेले में गांव की महिलाओं द्वारा पारंपरिक झूमेल नृत्य किया जाता है। मेले में आने वाले सभी श्रद्धालुओं को संयुक्त पंचायत द्वारा भोजन की व्यवस्था की जाती है सभी लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है।

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